अमरनाथ धाम की
यात्रा 28 मई से
शुरू हो चुकी
है। यह यात्रा
कुल 55 दिनों तक चलेगी।
20 अगस्त को रक्षाबंधन
के दिन अमरनाथ
गुफा के आखिरी
दर्शन होंगे। अमरनाथ
गुफा तक पहुंचने
के लिए 48 किलोमीटर
के दुर्गम रास्तों
को पार करना
पड़ता है।
मार्ग की कठिनाइयों
और जोखिम को
जानने के बाद
भी हर साल
इस पवित्र गुफा
के दर्शनों के
लिए लाखों की
तादाद में तीर्थयात्री
आते हैं। इसका
कारण सिर्फ अमरनाथ
गुफा का दर्शन
करना नहीं है।
इस गुफा तक
पहुंचने से पहले
कई ऐसे पड़ाव
आते हैं जो
तीर्थस्थल के समान
पवित्र और पूजनीय
हैं।
इन स्थानों के
दर्शन करने से
भी पुण्य की
प्राप्ति होती है।
इन स्थानों का
संबंध उस अमर
कथा है जिसकी
वजह से देवी
पार्वती अमर हुई
और अमरनाथ गुफा
में अद्भुत शिवलिंग
प्रकट हुआ।
पहला पड़ाव - चंदनबाड़ी
अमरनाथ यात्रा की पैदल
यात्रा पहलगाम से शुरू
होती है। पहलगाम
से पहला धार्मिक
पड़ाव चंदनबाड़ी है।
इसकी दूरी पहलगाम
से 16 किलोमीटर है।
मार्ग में नुनवन
नामक स्थान आता
है जहां यात्रियों
की सुरक्षा जांच
की जाती है।
चंदनबाड़ी के विषय
में मान्यता है
कि जब भगवान
शिव देवी पार्वती
को अमर कथा
सुनाने जा रहे
थे तब इस
स्थान पर अपने
माथे और शरीर
पर लगा हुआ
चंदन उतार कर
रख दिया।
भगवान शिव के
माथे पर शोभा
बना चंदन जब
यहां लगा तो
ये स्थान शिवमय
हो गया है।
माना जाता है
कि यहीं पर
भगवान शिव ने
अपने मस्तक पर
धारण चन्द्रमा को
भी उतारकर रखा
था। चन्द्रमा ने
यहीं पर शिव
के लौटकर आने
का इंतजार किया
था।
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दूसरा पड़ाव - पिस्सू टॉप
अमर नाथ यात्रा
का दूसरा और
खूबसूरत पड़ाव है पिस्सू
टॉप। यह स्थान
चंदनबाड़ी से आठ
किलोमीटर दूर है।
दूसरे दिन की
यात्रा पिस्सू घाटी की
चढ़ाई से शुरू
होती है। पिस्सू
टॉप के विषय
में मान्यता है
कि भगवान शिव
ने यहां पर
अपनी जटाओं में
मौजूद पिस्सुओं को
यहां पर उतार
कर रख दिया
था।
पिस्सू घाटी के
विषय में यह
भी मान्यता है
कि यहां पर
देवताओं और असुरों
के बीच घमासान
युद्घ हुआ था।
इस युद्घ में
देवताओं ने असुरों
को पराजित कर
दिया। चंदनबाड़ी से
पिस्सू टॉप की
चढ़ाई काफी कठिन
है। बहुत से
तीर्थयात्री पिस्सू टॉप की
चढ़ाई खच्चरों पर
बैठकर पूरी करते
हैं।
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तीसरा पढ़ाव - शेषनाग
पिस्सू टॉप के
बाद तीसरा पड़ाव
आता है शेषनाग।
यहां एक मनोरम
झील है जो
शेषनाग झील कहलाती
है। पौराणिक कथा
के अनुसार यहां
भगवान शिव ने
पवित्र गुफा की
ओर जाते समय
अपने गले में
धारण किए हुए
नाग को उतारकर
रखा था।नागराज ने
यहीं पर भगवान
शिव का इंतजार
किया। दूसरे दिन
तीर्थयात्री इसी पढ़ाव
पर रात्रि विश्राम
करते हैं। ऐसा
कहा जाता है
कि शेषनाग झील
में शेषनाग का
निवास है और
चौबीस घंटे में
शेषनाग एक बार
झील से बाहर
आकर दर्शन देते
हैं। कुछ ही
सौभाग्यशाली लोगों को इनके
दर्शन का सौभाग्य
प्राप्त होता है।व्यवहारिक
दृष्टि से भी
यह झील ऐसा
लगती है मानो
इसके चारों ओर
शेषनाग का फन
फैला हो। क्योंकि
इसके चारों तरह
सात पहाड़ियां शेषनाग
के फन की
तरह सिर उठाए
खड़ी हैं।
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अंतिम पड़ाव - पंचतरणी
शेषनाग के बाद
चौथा और अंतिम
पड़ाव है पंचतरणी।
इस पढ़ाव से
पवित्र गुफा की
दूरी महज 6 किलोमीटर
रह जाती है।
शेषनाग से यात्रा
पूरी करने के
बाद तीसरे दिन
तीर्थयात्री पंचतरणी पहुंचकर विश्राम
करते हैं।अगले दिन
सुबह यहां से
यात्रा आरंभ होती
है और भक्तजन
तीन किलोमीटर तक
बर्फीले रास्ते पर चलकर
पवित्र गुफा के
दर्शन करते हैं।
पंचतरणी के विषय
में माना जाता
है कि भगवान
शिव ने यहां
पर पंच भूतों,
पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु
और आकाश का
त्याग किया था।इसके
बाद भगवान शिव
ने माता पार्वती
के साथ पवित्र
गुफा में प्रवेश
किया। यहां पर
पंचतरणी नदी की
पांच धाराएं प्रवाहित
होती हैं। ऐसी
मान्यता है कि
यह धाराएं भगवान
शिव की जटा
से निकली हैं।
पंचतरणी से तीन
किलोमीटर आगे अमरगंगा
नदी बहती है
जहां अमरगंगा और
पंचतरणी का संगम
होता है।
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